किशोरावस्था की समस्या

अगर आपका बच्चा भी किशोरावस्था की तरफ बढ़ रहा है, तो अब आपको अपने बच्चे के प्रति पहले से अधिक जागरूक होने की जरुरत है. किशोरावस्था  वह समय है, जब मानव अपना बचपन छोड़कर जवानी की दहलीज पर कदम रखता है. यह सेंसिटिव अवस्था १३ से १९ तक है. इस दौरान बहुत से मानसिक और शारीरिक परिवर्तन होने लगते हैं. अक्सर पैरेंट्स मानते हैं कि बच्चों की देखभाल उनके बचपन तक ही जरूरी होती है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि किशोरावस्था वह नाजुक मोड़ है जब मामूली सी लापरवाही जीवन भर के लिए एक अभिशाप बन सकती है.

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किशोरावस्था के कई सकारात्मक और नकारात्मक पहलू होते हैं. पूरी दुनिया उन्हें अलग सी नजर आने लगती है. उनके आसपास के लोग उन्हें अब सिर्फ स्त्री और पुरुष के रूप में नजर आने लगते हैं. लिंग भेद के प्रति उनकी पहली प्राथमिकता होने लगती है.  उनकी ज़िंदगियों में दोस्त सबसे महत्त्वपूर्ण होने लगते हैं. वे स्कूल, कॉलेज, या कार्यस्थल पर अपने दोस्तों के साथ समय बिताना पसंद करते हैं. और स्कूल के बाद भी और काम के बाद भी उनसे जुड़े ही रहते हैं.

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आजकल लोगों का गाँव से शहर के तरफ पलायन बढ़ने लगी है. इसके वजह से नुक्लेअर फॅमिली का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है. नुक्लेअर फॅमिली में जहाँ पेरेंट्स के अलावा उनके सिर्फ बच्चे होतें हैं. अब ऐसे फॅमिली में जहां माता पिता दोनों नौकरी करते हैं वहां किशोरों को काफी समय अकेले बिताना पड़ता है. अगर वह सही दिशा में हैं तब तो कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन गलत राह पर बढ़ने पर उन्हें रोकना जरूरी हो जाता है. इस उम्र में उत्सुकता इतनी अधिक होती है कि किशोर सही गलत का अंतर नहीं कर पाते. खासकर ऐसी स्थिति में तो पेरेंट्स को यह समझने की जरुरत है कि किशोरों के लिए यह स्थिति नई है इसलिए जरुरत है उन्हें अपने बच्चों के साथ अच्छी ताल-मेल बिठाये.

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युवाओं के बीच दोस्तियां बहुत भावनात्मक होती हैं और प्रतिबद्धता और विश्वास के बंधन अक्सर मज़बूत होते हैं. अब चुकी बात दोस्ती की है तो खुद सोचिये कि आपके बच्चे के लिए आपसे बढ़कर अच्छा दोस्त भला और कौन हो सकता है ! जितना परिपक्व, भरोसेमंद, फिक्रमंद, ईमानदार और सच्चा प्यार देने वाला दोस्त पेरेंट्स हो सकते हैं उतना मुझे नहीं लगता कोई और भी हो सकता है. ये बात आप जानते हैं कि अपने बच्चों का जितना भला आप चाहते हैं उतना शायद ही कोई और भी चाहेगा. फिर दोस्ती कि बात है तो आप से बढ़के और कोई नहीं हो सकता. अगर आप उनके अच्छे दोस्त हैं और उनको कोई समस्या आती है तो वे इसके बारे में आपसे जरूर बात करेंगे.

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अब चुकी आपसे अपनी सभी समस्याओं को शेयर करेंगे तो क्या आपको लगता है कि वे किसी मुशीबत में कभी आएंगे ! लेकिन होता क्या है, अधिकतर पेरेंट्स अपने बच्चों के बहुत खराब दोस्त होते हैं, जैसे – ये मत करो… वहां नहीं जाना है… तुम उससे बात नहीं करोगी… इत्यादि. तो जी, इसे हिटलरशाही कहते है, दोस्ती तो बिलकुल भी नहीं. तो आपका बच्चा कैसे आपसे खुल के जुड़ेगा ! उसे पता है कि आप उसे मन करेंगे या डाटेंगे. इसलिए वे बेचारे अपने लिए दूसरे दोस्त बनाते हैं. चूंकि उनके दोस्त भी उसी अवस्था और मानसिकता से गुजर रहे होते हैं, इसलिए वे उनको बेतुकी सलाह ही देते हैं. बेहतर स्थिति तो यह है कि अगर उन्हें कोई समस्या है तो वो आपके पास आएं, लेकिन अगर आप खुद को बॉस समझते हैं तो वे आपके पास नहीं आएंगे.

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याद रखने कि जरुरत है कि हर बच्चा सबसे पहले अपने पेरेंट्स पर ही भरोसा करता है. इसे बनाए रखना और इसमें आगे बढ़ोतरी करते रहना पेरेंट्स का काम है. अब चुकी आके बच्चे हैं, अभी दुनियां देखना उन्होंने शुरू ही किया है और सबसे बड़ी बात है जनरेशन गैपिंग का जैसे “हमारे ज़माने में ऐसा तो नहीं होता था इत्यादि” अजी ये जमाना आपका नहीं है बल्कि आपके बच्चे का है. ऐसे में आपका आपके बच्चो से असहमतियां होना नार्मल है. असहमतियां और बहसें टाली नहीं जा सकती हैं, अगर असहमतियां प्रेम से और तार्किक तरीक़ों से सुलझा ली जाएं और उसमें अहम न हो या ये रवैया न हो कि मैं ऐसा कहता हूं इसलिए यही सही है, या मारने पीटने न लग जाएं, तो बच्चा इस विश्वास के साथ बड़ा होगा कि उसके मांबाप उनके ऊपर कोई भी परेशानी आने पर और मत भिन्नता होने पर प्रचंड रवैया नहीं अपनाएंगें, बच्चे को यकीन होगा कि उनकी सुनी जायेगी और उन्हें समझा जाएगा.

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किशोरावस्था वह अवस्था है जब वे अपने पेरेंट्स की दुनिया से हट कर अपनी एक पहचान बनाने की चाह रखने लगते हैं. उन के आसपास की दुनिया लगातार बदलती रहती है और ऐसे बदलाव में प्रेशर का होना भी नार्मल है, और जब प्रेशर है तो उनकी परेशानी का बढ़ना भी उचित है.  ऐसे में उन्हें लगता है कि कुछ भी चीज उन के कण्ट्रोल में नहीं है.

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पेरेंट्स को अपने बच्चो कि मानसिकतओं को समझते हुए उन के साथ जैसे को तैसा वाली नीति न अपनाकर उनके साथ खुद को रंग ले. उन्हें उचित व्यवहार करना सिखाएं और उन के अनुचित व्यवहार पर कभी गलत टिप्पणी न करें. आजकल के बच्चे भी जानते हैं कि क्या गलत है और क्या सही. केवल उन्हें ऐक्सपैरिमैंट करना पसंद होता है. इसलिए उन्हें ऐसा आजादी वाला माहौल दें कि वे अपने ऐक्सपैरिमैंट्स को आप के साथ बांटें. याद रखें कि यह एक अस्थायी दौर है और जल्द ही बीत जाएगा.

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पेरैंट्स के लिए यह समझना आवश्यक है कि किशोरावस्था में मूड स्विंग होना एक नैचुरल प्रक्रिया है. उन के लिए इस समय धैर्य रखना और समस्या की तह तक जाना आवश्यक है. उन्हें इस समय अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहिए, हालांकि इस समय किशोर अकेला रहना या अपने मित्रों के साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं पेरैंट्स का उन से कुछ भी पूछना उन्हें किसी हस्तक्षेप से कम नहीं लगता. उन के साथ कम्यूनिकेशन बनाए रखें और बिना किसी विवाद में पड़े खुले मन से उन की बातों व विचारों को सुनें. इस समय उन के मन में क्या चल रहा है, यह जानना जरूरी है, तभी आप उन का विश्वास जीत कर उन से हर बात शेयर करने को कह सकते हैं.

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