मैं… सिर्फ एक गाली हूँ. (सच्ची घटना)

ज़िन्दगी कुछ ऐसे लम्हें दिखाती जो अकल्पनीय और अनअपेक्षित होती है. लेकिन ऐसे लम्हे शायद हर किसी के ज़िन्दगी में नहीं आते. इसलिए इन लम्हों को किसी के द्वारा सच मान लेना मुश्किल है, क्योंकि ये हमारे विचारधारा से बिल्कुल अलग और एक बड़ा आश्चर्य है. क्योंकि ऐसा होता ही नहीं.

पर अगर किसी के साथ ऐसा हो जाए तो !

क्या कहेंगे आप इसे !

बात 98 की है. मैं जॉब की तलाश में दिल्ली आया था. नए सहर में मेरा पुराना कोई नहीं था, कुछ लोग थे भी, पर न के समान ही. न्यूज़ पेपर में जॉब वेकन्सी की  ऐड देखकर, सभी एड्रेस को एक-एक करके ढूंढता था और इंटरव्यूज दिया करता था. लेकिन एड्रेस कुछ इस तरह ढूंढे जाते थे – दिल्ली के एक कोने में 11 बजे की इंटरव्यू और दूसरे कोने में 1 बजे की. फिर पहले कोने में 3 बजे की. एक तो नया सहर, नए लोग, आज कीतरह न कोई एड्रेस ढूंढ़ने वाली कोई टेक्नोलॉजी और तो और मोबाइल भी नहीं.

बस स्टॉप है कहीं…

उतरना कही और हो रहा है.

बस से उतरो तो गलियों को ढूंढो, फिर गली में बिल्डिंग ढूंढो.

अगर बिल्डिंग सीरियल नंबर से हो तो आसानी से मिल जाए,

पर नंबर इधर-उधर हो तो कड़ाके की 42 डिग्री वाली धुप में, सोचिये क्या गुजरता होगा.

पैसे कुछ ही थें, जो घर से लेकर आया था. वो भी दिन भर की लम्बी भाग दौर में धीरे-धीरे खिसकने लगें. जॉब में फ्रेशर होने के वजह से कहीं कोई पॉजिटिव रेस्पोंस नहीं. बस बायोडाटा कॉपी कराये जाओ और घूमते रहों चौराहों पर हाथ में पेपर कटिंग लिए. एड्रेस ढूंढ़ने के दौर में, जानलेवा धुप के निचे, दो – दो या तीन-तीन किलोमीटर का चलना, वो भी एक तनाव में. प्यास जब बर्दास्त से बाहर होने लगे तो रास्ते में पहले कोई भी ऑफिस ढूंढो फिर उसमे किसी बहाने घुसो और फिर सॉरी बोलकर अंग्रेजी में पानी मांगो, मिल जाने पर पिछली और अगली प्यास दोनों के कोटे पुरे करने के लिए छक के पानी पियों. बार-बार पानी लाने से परेशान होकर ऑफिस वाले अजीब मुंह बना के देखते थे. मैं भी ढीठ बना रहता था. कौन सा मुझे वो जानते थे जो मेरी शिकायत होती.

दौरते-भागते पैसे ख़त्म.

अभी जॉब का कोई अता-पता नहीं.

पैसे बस इतने बच गए थे जिससे मैं एक ब्रेड पैकेट और 50 ग्राम चीनी ले पाया था. जिन्हे अब एक ही दिन में खाना मना था, क्योंकि आज ही पूरी पैकेट खालेंगे तो फिर अगले दिन ?

यहाँ भी ढीठ बना रहा, पुरे सात दिन तक उन्हें टुकड़े-टुकड़े करके, चुटकी भर चीनी को पानी के साथ लेकर खाता रहा. वैसे पीने के लिए किराए के रूम में पानी की कमी नहीं थी, उसका खूब लाभ उठाया. सोचा खाने को कुछ नहीं तो क्या हुआ पानी तो है… इसे ही एन्जॉय करो.

अब इंटरव्यू के लिए बस में जाना है, वो भी बन ठन के टाई वाले बाबू. अब जेब में पैसे नहीं. बस में कैसे घुसू ! पैसे न देने पर कंडक्टर कान पकर के अगले स्टॉप में फेक देता,इसलिए सोचा पहले ही कंडक्टर को बता दिया जाए की भैया पर्स घर पे रह गया और जाना भी जरूरी है. तो बेचारा टाई शाइ देखके खुद ही कहेगा ‘आ जाओ बैठ जाओ’ और हुआ भी यही. पर अगले बस में कंडक्टर को पहले देखना होगा कि कही वही कंडक्टर तो नहीं. अगर दूसरा है तो फिर वही मासूम चेहरा और पर्स का घर में छूट जाना. फार्मूला कई दिनों तक चलता रहा.

 

एक दिन.

इंटरव्यू का पता था जीवी रोड.

बिल्डिंग नंबर भी आसानी से मिल गयी. सीढ़ी चढ़ने से पहले पसीने से तर बतर चेहरा साफ़ करता, रोड पे खड़े कार के सीसे में बाल ठीक करके. चेहरे की परेशानी को जेब में घुसेडो और मुस्कुराते हुए ऑफिस में पहुँचो.

उस दिन भी अपने मुरझाये चेहरे से मुस्कुराता हुआ, दिए गए पता वाले फ्लैट में घुसा.

ऑफिस में घुसते ही झटका लगा.

गेट के सामने एक फटे पुराने सोफे पर एक अजीब सी औरत बैठी थी.

दूसरे तरफ मेज पर छोटे-छोटे कपडे और गहरे भद्दे मेकअप में 9-10 लड़कियां बैठी थी.

मेरे घुसते ही सारे अजीब सी मुस्कुराहटों से मुझे देखने लगें.

कुछ पल मूझे भी प्राउड फील हुआ की चलो इतनी साड़ी लड़कियां मुझे स्माइल दे रही हैं.

गेट पे बैठी औरत बोली “ले जा”

माहौल को समझते हुए उसकी बात मेरी समझ आ गयी थी. खुद को संभाल पाता उससे पहले मुंह से निकल गए “जी इंटरव्यू के लिए आया था”

कड़क आवाज़ में औरत बोली “जा न, दे इंटरव्यू, ले जा रे मोना… तुही लेजा, ले ले इसकी इंटरव्यू”

सारे हंसने लगे.

मैं कुछ निर्णय ले पाता उससे पहले ही जींस, पिंक टॉप, हाई हील सैंडल और घने लम्बे बिखरते बालों के बीच एक सावली-सलोनी चेहरा वाली ‘मोना’ खड़ी थी.

मोना “चल”

मैं निशब्द मूरत बने वैसे ही खड़ा रहा.

मोना (मेरी हथेली पकरके एक कमरे की तरफ ले जाने लगी) “चल न !”

मुझे यकीं हो गया था की ये कोई ऑफिस नहीं बल्कि किसी रेड लाइट एरिया का एक कोठा है. दिलकी धड़कन घबराहट से तेज होने लगे. मैं उसे रोकना चाह रहा था, पर मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे. मेरी हवा गुम थी.

मोना मुझे एक छोटे से कमरे में ले आयी और कुण्डी बंद कर ली. कमरे में गन्दा सा एक बेड रखा था. उसपर अपना पर्स रखकर झट से अपना टॉप उतार दी, और अब अपने जींस को उतारने की मसक्कत में लगी थी.

मैं बूत बना उसके नंगे होते शरीर को देख रहा था. ज़िन्दगी में पहली बार मुझे ऐसा कुछ देखने को मिल रहा था. सच कहूं तो मज़ा मुझे भी आने लगा था, पर अगले ही पल ध्यान आया कि जेब में तो फूटी कौड़ी नहीं है… अब क्या होगा ?

मैं समझ गया था कि कैसे करके भी यहाँ से भाग नहीं तो जबरदस्त कुटाई होने वाली है. अभी तो ये वेश्या अपने कपड़े उतार रही है. कमरे से बाहर निकलते ही मेरी उतरेगी. वो भी चीथड़ों में.

मोना अब जींस उतार चुकी थी “अरे मुझे निहार क्या रहा है ? जी भर के देख लेना, कपडे तो उतार फटाफट”

मैं सिर्फ सिर हिला के ‘हाँ’ कह पाया, और इधर-उधर देखने लगा.

मोना (हँसते हुए) “समझ गयी मैं, ऐसी जगह पे तू पहली बार आया न ?”

मैं इशारे से ‘हाँ’ कहा.

मोना (जोर से हंसने लगी) “तेरी हालत देख कर ऐसा लग रहा जैसे तेरा बलात्कार होने वाला है. क्यों रे लड़की को पहली बार पूरी तरह नंगा देखा क्या ?”

मेरा कोई रिएक्शन नहीं.

मोना “बोल न, तेरा ये पहली बार है क्या !”

मैं इशारे से ‘हाँ’ कहा.

अब वो मेरी टाई ढीली करके शर्ट के बटन खोलने लगी “पहली बार हर कोई नर्वस होता है, पर तू टेंशन मत ले. मैं सब सीखा दूंगी आज” मेरे माथे से टपकते पसीना को देख कर “हे भगवान… तू तो लड़कियों कि तरह डरा हुआ है” अपने पर्स से रुमाल निकाल कर मुझे दी “ले पसीना पोछ, डरता क्यों है, देख अभी तुझे कितना मज़ा आएगा”

ये सब मेरे साथ पहली बार हो रहा था. ऐसी जगहों को फिल्मों में कई बार देखा था, पर ज़िन्दगी भटकाते हुए आज यहाँ भी पंहुचा दी थी, जिसके बारे में कभी सोचा भी नहीं था.

मेरी मुसीबतें बढ़ती ही जा रही थी.जेब में एक चवन्नी भी नहीं… घर में 6 दिन पुरानी ब्रेड के कुछ सूखे हुए टुकड़े… कागज में चिपके चींटी लगी हुई कुछ चीनी… ऊपर से दिन भर की भाग-दौड़. आँखें बंद करके गहरी सांस लेता हुआ अपने देवताओं को कोशने लगा ‘हे प्रभु अब तक जो दिखा रहे थे वो कम था क्या !’

मेरे शर्ट के बटन्स खुल चुके थे. अब वो मेरा बेल्ट खोलने लगी. अचानक मेरे हाथ उसके हाथ को पकड़ लिया.

वो सिर उठा के मुझे देखने लगी. मेरी आँखें आंसुओं से भरें थें.

वो खड़ी होकर, मुझे देखने लगी.

हिम्मत करके मैं बोला “मैं ये सब नहीं कर सकता, प्लीज मुझे जाने दीजिये”

मोना “अरे तो फिर आया ही क्यों था ? इतनी देर से समझा रही हूँ कि डर मत मैं फुल कोपरेट करुँगी…”

मैं “मैं गलती से यहाँ आ गया” जेब में रखे पेपर कट को दिखाता हुआ “मुझे इस एड्रेस पर जाना था इंटरव्यू के लिए और गलती से यहाँ आ गया. मुझे तो पता भी नहीं था कि ये…”

पेपर कट देखते हुए बोली “अरे ये तो हमारे ऊपर का फ्लोर है, उसी में ऑफिस है. ये तो अपर ग्राउंड फ्लोर है और तेरा एड्रेस फर्स्ट फ्लोर का है.”

मैं “जी आपसे हाथ जोड़ता हूँ अब मुझे जाने दीजिये”

मोना “अरे जब आ गया और कपडे भी खुल गए, तो ले ले मस्ती. देख इतनी देर से तेरे सामने बिल्कुल नंगी खड़ी हूँ.”

मैं “अरे इसके लिए आपको पैसे चाहिए होंगे और अपने जेब में फूटी कौड़ी नहीं.”

मोना (गंभीर होती हुई) “देख, पैसे तो तुझे देने ही होंगे, कुछ कर या मत कर”

मैं “मैडम, मैं 6 दिनों से भूखा हूँ. पानी पी-पी कर अपना पेट भरता आ रहा हूँ, और नौकड़ी की तलाश में दिन भर भाग रहा हूँ. कुछ पैसे घर से लाया भी था वो भी करीब महीने भर की भाग-दौड़ में खत्म हो गए. ‘पर्स घर में रह गया’ ऐसा बोल- बोल कर बस में चढ़ रहा हूँ…”

मेरा गला भर आया था. आँख-नाक से पानी बहने लगे थे.

वो कुछ देर मुझे देखती रही.

फिर अपने रुमाल से मेरी आसुंओ और नाक से बहते पानी को साफ़ करने लगी.

मैं लाचार बूत बना खड़ा था.

वो कुछ देर मुझे देखती रही फिर अपने पर्स में रखे पैसे निकाल के गिनने लगी.

मोना (मुझे पैसे देती हुई) “ये ले.”

मैं “ये…?”

मोना “अरे बाहर जो खाला बैठी है, वो तेरे यहाँ से निकलते ही, इस काम के पैसे मांगेगी. उसे दे देना”

मैं “मैं आपके पैसे नहीं ले…”

मोना “अरे पागल है क्या ? पैसे बाहर नहीं देगा तो अच्छी तरह धुलाई होगी सो होगी. ऊपर से अपने पैसे वसूलने के लिए तुझे यहाँ नौकर बना के रखेगी. रख ले ये पैसे, दे देना उसे.” पर्स से ढूंढ के कुछ और पैसे निकाली और मेरे शर्ट के जेब में डालते हुए बोली “ये मेरा शगुन है, मना मत करना. जा इंटरव्यू दे, तेरी जॉब पक्की लग जायेगी”

उसकी सहानुभूति देख के, मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरे सामने जो नंगी लड़की खड़ी है, वो एक वेश्या नहीं कोई देवी है.

उसकी ये बात सुनते ही, मेरे सारे दुःख-दर्द दूर हो गए. विस्वास कीजिये… गजब का चमत्कार सा हुआ. मेरी सभी परेशानियां मेरे दिमाग से फुर्र्र. एक अजीब सा आत्म-विस्वास मुझमे आ गया… मेरे मुरझाये चेहरे एक दम से खिल उठे.

हम दोनों ने अपने-अपने कपडे पहने और वो गेट की कुण्डी खोलने लगी. मेरे हाथ, उसके कुण्डी खोलती हाथ को पकड़ लिया. मुझे देखने लगी.

मैं “आपको बुरा न लगे तो एक बात पूछूं ?”

मोना “बोल”

मैं “आप एडुकेटेड लगतीं हैं, फिर ये सब…”

मोना (हंसने लगी) “एडुकेटेड लोगों को मौज मस्ती मना है क्या !”

मैं “मौज मस्ती ? आप इसे मौज मस्ती कहती हैं ?”

मोना “तो तू ही बता क्या है ये !”

मैं उसे देखने लगा.

मोना “चल, तू तो गलती से आ गया. पर रात – दिन लोगों के मज़मे यहाँ किसलिए होते है ! अरे मस्ती के लिए ही लोग आते न यहाँ !”

मैं “मुझे नहीं लगता कि आपको ये सब करना अच्छा लगता होगा”

मोना “तू इतनी देर से मेरे साथ है. एक पल भी कोई अफ़सोस या दुःख जैसी कोई बात मुझमे नज़र आयी तुझे ?”

मैं “मोना जी, वक्त ने मुझे जो आज दिखाया है, बेशक ये पहली बार है पर इतनी समझ तो है कि इस तरह के काम करने वाली महिलायें अपने किसी मजबूरी के दबाव में ये सब करती हैं”

मोना “चल समझ ले जैसा मजबूर आज तू है, वैसी ही मजबूरी मेरी है.”

मैं “मेरी मजबूरी जॉब मिलते ही ख़त्म हो जायेगी. आप पढ़ी-लिखी हैं. अच्छी सी जॉब तो आपको भी मिल जायेगी और इतनी खूबसूरत और समझदार हैं आप. आपको तो कोई भी अच्छा लड़का शादी के लिए मिल जाएगा… क्यों ऐसे नर्क की जिंदगी जी रही हैं !”

जोर से हंसने लगी.

मैं “मोना जी, मै कोई मजाक नहीं कर रहा”

मोना “सुन न, मैं खूबसूरत हूँ… समझदार भी हूँ… तो चल तू ही कर ले शादी”

मेरे पास कोई जवाब नहीं था.

मोना “फट गयी ? घुस गए तेरे लेक्चर तेरे पिछुआरे न !”

मैं फिर से निरुत्तर था.

मोना “तू ये सब छोड़, जा ख़ुशी ख़ुशी, कॉन्फिडेंस के साथ अपने इंटरव्यू दे और अपनी जॉब ज्वाइन कर.”

मैं निशब्द उसे देख रहा था. कुछ पल की ही मुलाकात में उससे मुझे एक अजीब सी आकर्षण होने लगी थी. इस नर्क वाली ज़िन्दगी में उसे छोड़ के जाने का मन बिल्कुल नहीं हो रहा था.

मोना चुटकी बजाती हुई “कहाँ खो गए !”

मैं (चौंकते हुए) “कुछ नहीं”

मोना “चलो अब निकलते हैं, नहीं तो खाला चिल्लाने लगेगी”

मोना दरवाजे की कुण्डी खोलने लगी.

मैं “मोना जी बस एक सेकंड प्लीज…”

मोना रुकी.

मैं “एक शगुन आपने खुद ही दे दिया. मै दूसरा मांगू ?”

मोना “बोल ना !”

मैं (उसके क़दमों की तरफ देखता हुआ) “आपके पैर छूना चाहता हूँ…”

वो आश्चर्य से मुझे देखने लगी.

मोना “हम धंदे वाली हैं, हमारे शरीर के हर हिस्से को लोग छूना तो क्या… निम्बू की तरह निचोड़ते है. पर हमारी मैली चरण छूने की इजाजत किसी को नहीं बाबू. गंदे हो जाओगे”

मैं निशब्द था. कुछ न कह पाया, उसे देखता रहा और वो मुझे.

अचानक जोर से हंसती हुई बोली “था न गजब का फिल्मी डायलाग !”

मैं दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा और कुण्डी खोलने को हाथ उठाया ही था कि उसने मेरे हाथ पकड़ लिए. मुझे बड़े प्यार से अपने तरफ खींचा और मेरे गले लग गयी. मैंने भी अपने दोनों हाथों से उसके पीठ थपथपाने लगा. वो मेरे सिर पर हाथ फेरती बोली “झल्ला है तू…” मेरे दोनों गालों को मसलते  हुए “तूने अपने भूख को हराया है… अब तू किसी से नहीं हार सकता. ओके !”

मैं “यस”

मोनिका “बेस्ट ऑफ़ लक”

गेट खुली और हम कमरे से बाहर निकलें. धीमी आवाज़ में गाना बज रहा था ‘ठाड़े रहियो ओ बांकें यार’ कोठे वाली वो खाला, पान चबाती मुझे देखने लगी. पैसे उसके हाथ में देकर बाहर निकल लिया. पलट के देखा तो मोनिका मुझे ही देख रही थी. उसे स्माइल देकर मैं ऊपर की सीढ़ी चढ़ने लगा.

(आज इतना ही, आगे की बातें फिर कभी…)

5 Comments Add yours

  1. बहुत मस्त

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    1. आपका साभार 🙂

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  2. sakshamcatv says:

    आपकी रचना जीवन की वास्तविकता में भी रोमांटिक है।

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    1. रोमांस के बगैर ज़िन्दगी वैसी ही रह जाती है जैसे… जैसे… जैसे… चायपत्ती के बगैर चाय! या फिर जैसे… कत्था के बगैर पान!

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    2. आपका आना अच्छा लगा. आते रहिये. 🙂

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