मैं… सिर्फ एक गाली हूँ. (Part – II)

फर्स्ट फ्लोर पे पंहुचा, गेट पर ग्लास डोर लगा था. मैंने गेट खोलने के लिए अंदर धकेला तो गेट बंद था. सामने रिसेप्शन पर बैठा सिक्योरिटी गार्ड गेट पर आया और गेट हल्का सा खोल कर पूछा “हाँ जी?”

“जी इंटरव्यू के लिए आया हूँ” उत्सुकता से जवाब दिया.

“हो गया अब. जाओ”

“अरे! हो गया मतलब?” मैं घबराया.

“वेकन्सी फुल हो गयी भाई, जा अब”

“बॉस बैठे हैं?” मेरी आवाज़ में फुल कॉन्फिडेंस था.

“तो?”

“अरे तो क्या? उनसे मेरी बात हुई थी. उन्होंने ही मुझे बुलाया है” झूठ सॉलिड वाला था.

गार्ड साइड हो गया “आपको पहले बताना चाहिए था न.” मैं अंदर घुसा तो मुझे एक केबिन को दिखाते बोला “जाइये, साहब अंदर है”

अब झूठ बोल कर  ऑफिस में एंट्री तो लेली थी, पर केबिन में जाते हुए डर लग रहा था. इंटरव्यू के लिए कहूंगा तो पता नहीं कैसे रियेक्ट करेगा. गार्ड अगर ऑफिस में एंट्री नहीं दे रहा था तो जरूर इसने ही मना किया होगा.

गार्ड की आवाज़ गूंजी “जाइये साहब, उसी केबिन में बॉस बैठे हैं”

धड़कते दिल से केबिन का गेट खोला फिर अंदर आने की परमिशन मांगी जो ग्रांट भी हो गयी. अपना बायो डाटा टेबल पर रखा. फ्रेंच कट में बैठा अधेड़ उम्र का आदमी मुझे देखने लगा. “आप अंदर कैसे आ गए?”

लो मर गया.

संभाला खुद को, स्मार्टली जवाब दिया “सर, आपने ही तो परमिशन दी हैं अभी”

“केबिन की नहीं, मैं ऑफिस में आने की पूछ रहा हूँ”

“सर, अभी कुछ देर पहले आपसे फोन पर बात हुई थी, आपने 10,000 की सैलरी भी ऑफर की थी .” अब सीधा बड़ा वाला पन्गा ले चुका  था, क्योंकि उन दिनों की 10,000 की सैलरी आज के 50,000 से कम नहीं थे.

मुझे एक टक देखता रहा, फिर बैठने का इशारा करते हुए बोला “सीट”

मैं, उसके सामने रखे चेयर पर मंजे हुए नटवरलाल की तरह जा बैठा.

मेरे बायोडाटा को गौर से देखते हुए पूछा “किस पोस्ट के लिए मैंने दस हज़ार ऑफर किया हैं?”

“सर, EDP मैनेजर के लिए, आपने खुद ही कहा है कि कंप्यूटर डिपार्टमेंट से आप दुखी हैं, आपको मेरे जैसे ही एक्टिव सहायक की जरूरत है”

अपना गंजा सिर खुजलाता हुआ इधर-उधर देखने लगा. मुझे लगा मेरी धुलाई के लिए कोई सॉलिड आइटम ढूंढ रहा है. मेरी बुद्धिमानी अब वहां से जल्दी खिसक लेने में ही थी. मैं खड़ा हो गया और बोला  “लगता है सर आपको अब मेरी जरूरत नहीं है, थैंक यू” बोलता हुआ मैं केबिन के गेट की तरफ लपका.

“बैठो” कड़क आवाज सुन कर मैं काँप गया. पर अपने थोबड़े पर रहीसी बरक़रार रखते हुए उसकी तरफ पलटा. वह  बैठने का इशारा कर रहा था. मैं बैठ गया. टेबल पर रखे कलम को अपने उँगलियों से घुमाता हुआ बोला “EDP की पूरी टीम मुझे चेंज करनी हैं. नई टीम स्मार्ट और एक्टिव होनी चाहिए. जो तुम्हे ही अर्रेंज करनी होंगी, वो भी सिर्फ दो दिनों में. पूरे दस के दस प्रोग्रामर्स. कर पाओगे?”

“सर, दो दिनों बाद नई टीम अपने टाइम पर ऑफिस पहुंच जायेगी” भूखे पेट से आवाज़ निकल नहीं रहे थे, पर मंजे हुए फिल्मी हीरो की तरह फुल कॉन्फिडेंस से डायलाग ठोक डाली.

“गुड” अपने फ्रेंच दाढ़ी को सहलाता हुआ बोला “आपकी टीम में मुझे फ्रेशर एक भी नहीं चाहिए, इसका ध्यान रखना”

सोचने लगा कि, यार ये आदमी कर क्या रहा है? मेरी बायोडाटा भी गौर से इसने देखा. उसमे साफ़ लिखा है मैं फ्रेशर हूँ. खैर, ये अभी सोचने का वक्त नहीं था. फिलहाल तो इसके एक के बाद एक गोलियों की रफ़्तार में आते बाउंसर्स से खुद को संभालना है नहीं तो मेरा सिर फटना या कोई हड्डी टूटना तो तय है.

“किस सोंच में पड़ गए आप?”

“ऑफकोर्स सर! सारे वेल एक्सपेरिएंस्ड होंगे. डोंट वोर्री.”

हैंड शेक के लिए मेरी तरफ हाँथ बढ़ाया, मैं खड़ा हो गया और झुककर उससे हाँथ मिलाने लगा.

“बेस्ट ऑफ़ लक” उसने स्माइल दी. मैं निकल आया. गौर से ऑफिस को देखने लगा. उन दिनों ग्लास पार्टीशन के ट्रेंड नहीं थे. चारों तरफ बड़े-बड़े लकड़ियों के केबिन बनें थे.रूम फ्रेशनर की अच्छी खुशबू आ रही थी. रिसेप्शन के बगल में गणेश जी बैठे थे, सामने दीपक जल रहा था. हाथ जोड़ कर उनको प्रणाम किया और ऑफिस से निकल गया. सीढ़ी से उतरता हुआ सोचने लगा, नीचे मोनिका खड़ी होगी. जॉब के लिए पूछेगी क्या कहूं उसे? अभी जो कर के आया हूँ वो तो फिल्मों की एक्टिंग थी. आज तक कंप्यूटर ऑपरेटर भी नहीं बना था और चल दिए पूरे  डिपार्टमेंट के बॉस बनने. खुद पर  बहुत गुस्सा आ रहा था.

मैं बीच सीढ़ी पर ही रुक गया. नीचे उतरने की हिम्मत नहीं हो रही थी. मोनिका जरूर पूछेगी. उसे पता लगेगा कि जॉब यहाँ भी नहीं मिली तो दुखी हो जायेगी, क्योंकि मुझसे अधिक उसे भरोसा था कि यह वाली जॉब लग जायेगी.

“भाई साइड हो जा” आवाज सुनकर मैं चौंका. ऊपर देखा तो दो आदमी एक बड़ा सा प्लाई वुड नीचे उतार रहे थे. मैं साइड हो लिया और प्लाईवुड की आर में छुपता हुआ बिल्डिंग से बाहर निकल लिया और राहत की सांस ली और अपने आज के दिन को कोसने लगा, क्योंकि आज सुबह से दो-दो खतरनाक ट्रेजेडी से गुजरना पड़ा. अब रोने का दिल कर रहा था. मेरे हिम्मत अब पस्त होने लगी. आज का दिन भी बेकार गया. इस तरह से भूखे पेट कितने दिन और ? गले से टाई निकाल कर जेब में डाली और सिर पकड़कर जमीन पर बैठ गया. अब थक चुका था.

“अब और नहीं, बहुत हो चुका” अपनी  हथेलियों से चेहरा ढके बड़बड़ाया. दिल कह रहा था .ऐसे मर जाऊँगा मैं… चल अब अपने घर लौट चल. जान है तो जहान है. पर जाएं भी तो कैसे ? टिकट के पैसे कहाँ से लाऊँ? अचानक ध्यान आया कि मोनिका के शगुन वाले पैसे तो जेब में हैं. झट से जेब से पैसे निकाले. पांस सौ के नोट थे. अब काम हो गया. टिकट के पैसे तो है ही.शरीर में फुर्ती आ गयी. जमीन से उठकर खड़ा हो गया, पीछे पलट कर सीढ़ी की तरफ देखा, और मन ही मन मोनिका से कहने लगा ‘आऊंगा मोनिका. तुम्हारा बहुत बड़ा क़र्ज़ लेकर जा रहा हूँ. जरूर आऊंगा तुमसे मिलने’.  तेज कदमों से बस स्टॉप की  तरफ बढ़ने लगा. बस स्टॉप पहुँचते ही मेरे रूट की  बस आ गयी .बस में चढ़ कर गेट पर बैठे कंडक्टर से ५ के टिकट मांगे और पांच सौ का नोट बढ़ा दिया. कंडक्टर गुस्से से मुझे देखने लगा. बस चल चुकी थी .

अचानक गेट पर खड़ा लड़का चिल्लाने लगा “मैडम गिर जायेगी”

लड़की के चिल्लाने की आवाज़ आयी “अरे भाई हाँथ तो दे”

लड़का एक हाँथ से गेट का पायदान पकड़े हुए दूसरा हाँथ लड़की के तरफ बढ़ाया और झट से लड़की अब गेट पर थी. पर ये क्या! ये तो मोनिका थी. मुझे देखते ही बोली “धन्य प्राणी हो यार. बाप रे इतनी तेज आवाज़ लगाती हुई आ रही हूँ, मेरा तो गला दुखने लगा. तुम तो अपने धुन में मगन. खैर छोडो जॉब मिली ?” गेट से मेरे पास आ गयी.

मेरी बोलती बंद थी.

“भाई खुल्ले दे नै ते उतर ले” कंडक्टर मुझे मेरा पांच सौ का नोट वापिस करता हुआ मुझपर चिल्लाया.

मोनिका मुझसे पूछी “कितने देने हैं?”.

कंडक्टर “पांच के टिकट है, बंदा पांच सौ दे रहा है,जैसे बैंक मेरे बाप की है”

मोनिका कंडक्टर को दस का नोट देते हुए बोली “पांच के दो देदो”

मैं कभी कंडक्टर को कभी मोनिका को देख रहा था. कंडक्टर ने उसके हाँथ में एक और पांच का  टिकट दे दिया.

मोनिका मेरा हाँथ पकड़ कर बस के आगे वाली गेट तक ले आयी. बस स्टॉप पर बस रुकी और मुझे लेकर नीचे उतरने लगी.

हम कनाट प्लेस में थे.

मोनिका “अरे जॉब का क्या हुआ बताओ न!”

मुझे लगा मोनिका को सच बता देना चाहिए. फिर ऑफिस के गार्ड से झूठ बोल कर गेट खुलवाने वाली बात से लेकर नई टीम अरेंज करने वाली तक सभी बातें बता दीं.

“चल कोई नहीं. टेंशन मत ले, कोई बड़ी कंपनी में तेरी जॉब लगने वाली है. इसलिए यहाँ ये सब हुआ.”

एक ढाबे की तरफ मेरा हाँथ पकड़ कर ले जाने लगी “चल कस के भूख लगी है,पहले पेट पूजा करते हैं. फिर आगे की सोचते हैं”

मैं, मोनिका के दुबारा ऐसे मिलने से एक तरफ खुश था, तो दूसरी तरफ अपनी लाचारी और बेचारगी पर गुस्सा आ रहा था. मुझे पता था कि मोनिका को भूख नहीं लगी है. सिर्फ मुझे खाना खिलाने के लिए उसका ये पैतरा है. हम ढाबे में एक टेबल पर बैठ गए. टेबल पर रखीं मेनू को देखते हुए बोली “हमारी दोस्ती का यह पहला दिन है और पहली वार हम साथ में खाना खा रहे हैं तो कुछ स्पेशल तरीके से होना चाहिए. ऐसा करते हैं मेरी पसंद के आज तुम खाओगे और तुम्हारी पसंद के मैं खाउंगी. कैसा रहेगा?”

मैंने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए ‘हाँ’ में जवाब दिया.

“हाँ… वैसे तुम अपने सेलेक्ट किये हुए, मेरे वाले आइटम को खाना चाहो तो तुम शेयर कर सकते हो. मुझे बुरा नहीं लगेगा” और हसने लगी. “यार एक बात बताओ. तुम इतने कंजूस क्यों हो? इतने देर से मैं बक-बक किये जा रही हूँ और तुम गूंगे बने बैठे हो. तेरा ये सेव एनर्जी वाली फार्मूला है क्या!”

“मैडम, क्या लगाऊं?” वेटर पूछा.

“भैया बस दो मिनट” मोनिका ने रिक्वेस्ट की और वह चला गया.

मोनिका गौर से मेनू देखती हुई बोली “आपके लिए तो मेनू डिसाइड हो गया” मेनू मेरी तरफ बढ़ा दिया. “तुम अपनी पसंद का चूज करो.”

मैं भारी मन से मेनू देखने लगा.

मोनिका “मैं एक बात बताना तो भूल ही गयी. ये जो भी खर्च हो रहें हैं, तुम्हारे खाते में लिखे जाएंगे. तुम्हारी जॉब की सैलरी मिलने पर लौटा देना. भाई देखो जो है सो है. मैं अपनी चवन्नी भी नहीं खर्च करने वाली. पता है न किस चीज के कमाए पैसे हैं मेरे?”

वेटर फिर वापस आया “क्या लगाऊं?”

मोनिका “एक शाही पनीर, मिक्स वेज और दो बटर नान.” फिर मुझे देखने लगी.

मैं (मोनिका से) “इतना काफी है. बस दो नान और ले लेते हैं”

मोनिका “तुम्हारी मर्जी”

मैं (वेटर से) “भैया, जो मैडम बोली हैं बस उतना ही रहने दीजिये. सिर्फ दो नान बढ़ा दीजिये उसमे”

वेटर चला गया.

मोनिका (शरारती अंदाज में) “खुद पर खर्च का लोड आते देख सस्ते में निकल लिए गुरु.” फिर “ओये जानते हो मैं अभी कहाँ जाने के लिए निकली थी?”

मैंने सिर हिला कर ना में जवाब दिया. मेरा हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और कान से मुंह सटा कर धीमी आवाज़ में बोली “कॉल पर जाने के लिए निकली थी. पूरे दो हज़ार की पार्टी थी”

मैं “फिर गयी क्यों नहीं?”

“अरे नीचे आयी तो तुम दिख गए. तुम्हारी तरफ भाग कर आ ही रही थी कि एक ठरकी कस्टमर सामने आ गया, मुझे रोक लिया. कहने लगा कि मेरे पास ही जा रहा था. मुश्किल से उससे पीछा छुड़ाई, इतने में तुम दूऱ निकल गए. वो तो कहो भागने में चैंपियन रह चुकी हूँ इसलिए तुम पकडे गए.”

वेटर खाना लेकर आया और मोनिका इधर-उधर की बातें करती हुई मेरे सात दिनों के भूखे पेट को जबरदस्ती खाने से ठूस दी. विस्वास कीजिये, मुझे उस वक्त ऐसा लग रहा था कि दुनिया में अगर भगवान् कहीं है तो कहीं और नहीं, बस… धरती पर ही है. मेरा भगवान् तो अभी मेरे सामने था.

मोनिका खड़ी हो  गयी “चल मेरे साथ”

“कहाँ”

“अरे एक्सपेरिएंस्ड प्रोग्रामर्स ढूंढने!”

“मोनिका मैं खुद फ्रेशर हूँ, और एक्सपेरिएंस्ड लोगों का बॉस, कैसे संभव है?”

मोनिका बैठ गयी “एक बात बता, इतनी बड़ी कंपनी का मालिक बेवकूफ तो होगा नहीं! उसने कोई बात तेरे में देखी होगी तभी ऐसा ऑफर दिया है.”

“कमाल है. अरे बात – वात कुछ भी नहीं, उसने मेरे बायो डाटा को ध्यान से नहीं देखा होगा. फ़ोन पर बात करने वाले मेरे झूठ को भी उसने मान लिया. कुछ न कुछ प्लान है उसका” रुका. फिर “मोनिका, उसे पता है फ़ोन वाली झूठी बात से मैं उसे बेवकूफ बना रहा हूँ. इसलिए मुझे सबक सिखाने के लिए उसकी कोई चाल है.”

“सुन, बाद की बाद में सोचेंगे.अभी तू मेरी बात मान और चल मेरे साथ.”

उसे बुरा ना लगे, इसलिए मुझे उसकी बात माननी पड़ी.

कनाट प्लेस के एक बहुमंजिला इमारत में हम घुसे. लिफ्ट के सामने वाली लॉबी में फ्लोर वाइज कम्पनीज के नाम लिखे थे. मोनिका रुक कर उन्हें पढ़ने लगी. फिर लिफ्ट से हम पांचवे फ्लोर के ऑफिस में गए. रिसेप्शन पर एक लड़की बैठी थी. उसने हमें देखकर स्माइल दिया फिर पूछा “यस प्लीज!”

मोनिका “मैडम, हमें हमारी सॉफ्टवेयर कंपनी के लिए दस एक्सपेरिएंस्ड प्रोग्रामर्स चाहिए, वो भी आज से सिर्फ तीसरे दिन सुबह आठ बजे.”

लड़की “स्योर मैडम! मीटिंग रूम में बैठ कर बातें करें?”

मोनिका “सॉरी मैडम, वक्त कम है. हमारे साथ मीटिंग रूम में बैठकर जितना वक्त आप हमें देंगी, उतने वक्त में  शायद आपको एक कैंडिडेट मिल जाए. रही बात आपके कमीशन की, वो आपको कैंडिडेट से ही तय करने होंगे. उन्हें आप इंटरव्यू के  लिए वेडनेसडे सुबह आठ बजे मून लाइट होटल भेज देना. तो हम चले?”

लड़की “जी.”

मोनिका “आज मंडे है, याद रहे सिर्फ दो दिन है आपके पास.” मोनिका मुस्कुराने लगी.

हम ऑफिस से निकल गए. मैं हक्का बक्का था. सोचने लगा, कर क्या रही है ये?

“चल अब मौज करते हैं, तेरी सिर दर्द मैंने एक बड़ी एजेंसी को दे दी है. देखना क्रीम भेजेंगे ये”

लिफ्ट खुली हम उसके अंदर हो लिए.

मोनिका “क्या सोच रहा है?”

“तुमने कैंडिडेट्स को इंटरव्यू के लिए होटल में क्यों बुलाया?”

मोनिका “तो कहाँ बुलाती? जहाँ तेरा इंटरव्यू लिया था वहां?  न बाबा, एक बार में दस -दस मुस्टंडे नहीं संभाल सकती”

“मोनिका मैं मज़ाक नहीं कर रहा, होटल में इंटरव्यू के लिए हॉल बुक करने पड़ेंगे और इसके लिए कितने पैसे चाहिए होंगे तुम्हे अंदाजा है?”

“अबे काहे का पैसे, होटल हमारे फॅमिली आशिक का है.”

“फॅमिली आशिक?”

“अरे जैसे फॅमिली डॉक्टर पूरी फॅमिली के लिए होता है न! वैसे ही फॅमिली आशिक.”

“मतलब तुम्हारी पूरी फॅमिली ये सब…”

मोनिका सहज भाव से बोली “हाँ! बुराई क्या है! अरे बहुत मजेदार काम है. पैसा का पैसा और मजे अनलिमिटेड.”

मोनिका मुझसे जितनी खुलती जा रही थी, उतनी ही बड़ी पहेली बनती जा रही थी. एक तरफ इसकी अच्छाइयां. जिनका मुरीद होता जा रहा था मैं.

दूसरे तरफ, इसका या इसके पूरे फॅमिली का प्रोस्टीटूशन में होना और इस बात का बिलकुल भी इसे अफ़सोस न होना. मेरे मन में इसके प्रति घृणा वाली भावनाये पैदा कर रही थी.

मोनिका “सुन, यहाँ कहाँ रहते हो?”

“पटेल नगर”

मोनिका “वो तो पास में ही है, तेरे रूम पर चलते हैं” रोड साइड खड़ी ऑटो में बैठ गयी. मैं बाहर ही खड़े उसे हैरान होकर देख रहा था. उसने हाथ से ऑटो में आने का इशारा किया. मैं ऑटो में बैठ गया.

मोनिका (ऑटो ड्राइवर से) “भैया पटेल नगर” ऑटो चलने लगी.

मोनिका (मेरे कान से अपना मुंह सटा कर) “भाई अपने रूम पर तुम एक कॉल गर्ल ले जारहे हो. अब तो खुश हो जाओ.”

मुझसे रहा न गया “तुम एक अच्छी इंसान हो. बहुत अच्छी. तुम्हे ये भी पता है की सॉफ्टवेयर क्या होता है. तुम्हे पता है प्रोग्रामर क्या होता है. तुम उस रिसेप्शन वाली लड़की से भी अधिक स्मार्ट हो. फिर ये सब क्यों? तुम तो तुम तुम्हारी पूरी फॅमिली भी?”

मोनिका ठहाके लगाकर हसने लगी. फिर भागती हुई ऑटो से बाहर की तरफ इशारा करती बोली  “ये देखो. ये राजेंदर प्लेस है. सारे अच्छे अच्छे कम्पनीज हैं.

यहाँ का मेरा तीन कस्टरमर है वो भी परमानेंट. एक तो चिरकुट है, पैसे देने में किट -किट करता है. वो देखो. वो वाइट वाली बिल्डिंग.” मेरी तरफ देखती बोली “यहाँ तो एक बार बुरे फंसी. इन्होने दो बन्दे का बोल कर बुलाया और धीरे -धीरे करके सात बन्दे हो गए. बाप  रे बाप जान नीकाल दिया था. सबके -सब जानवर थे. जानवर नहीं बहन के टके नरभक्षी थे. मुझे तो लगा था आज तो गयी मैं”

“क्यों ? तुम्हे तो मजा आता है.”

“मैं अपनी दुखड़ा सुना रही हूँ और तुम मजे ले रहे हो. चल तेरे रूम में बताती हूँ की मजे किसे कहते हैं.”

ऑटो वाले ने आवाज लगायी “रेड लाइट से सीधा लेलूं ?”

मैं “हाँ भैया, आगे जूस की दूकान है. वही रोक देना” मैं ऑटो से बाहर देखने लगा. जूस की दुकान आ गयी. ऑटो रुक गयी. हम दोनों उतरने लगे.

मोनिका “कितने हो गए?”

ड्राइवर “तीस”

मोनिका पर्स से नीकाल कर पैसे दिए. हम दुकान के साथ वाली गली के तरफ बढ़ने लगे. कुछ देर बाद अपने रूम में थे. मोनिका रूम के कोने में रखे स्टोव, दूसरे कोने में मेरी बुक्स और उसके बगल में रखे पतली सी दरी और एक बाल्टी मग्गा को गौर से देखने लगी.

“कुछ ढूंढ रही हो?”

“अबे तेरे साथ नरभक्षी वाला खेल खेलूंगी. तेरा बिस्तर किधर है?”

मैं डरता हुआ कोने में रखे दरी के तरफ इशारा करते हुए बोला “वो रहा”

मुझे देखने लगी “बस. और तकिया?”

मैंने बुक्स के तरफ इशारा किया.

वो आश्चर्य से देखने लगी.

बोली “चल”

मैं “अब कहाँ?”

मोनिका “मार्केट”

गेट के बगल में नीचे रखे ताला चाबी उठाई और रूम से बाहर निकल गयी. मैं रूम में ही खड़ा उसे देख रहा था.

मोनिका “चलेगा या अकेली जाऊं?”

मुझे रूम से निकलना पड़ा. कुछ देर बाद हम मार्केट में थे.

डनलप का गद्दा, बेड शीट, पिल्लो,आईना, रसोई के ढेर सारे सामान के अलावा हाउसहोल्ड के कई छोटे-छोटे आइटम्स की खरीदारी होती रही और मैं मूक दर्शक बना देखता रहा. फिर सभी सामान को पैक करके साइकिल रिक्सा पर डाल दिए. रिक्सा पर हम बैठने ही जा रहे थे कि आवाज़ आयी “रूमा ! अच्छा हुआ तू मिल गयी”

हम पीछे पलटे तो एक बुजुर्ग खड़े मोनिका को देख रहे थे.

मोनिका “क्या हाल है भाटिया जी?”

भाटिया (हसता हुआ धीमी आवाज़ में) “अरे कई दिनों से परेशान कर रखी है. तुमसे मिलने के लिए जाने ही वाला था.” वह रुका और मुझे देखने लगा, “ये?”

मोनिका “दोस्त है”

मोनिका को आँख मारता हुआ “ले चलो इसे भी”

“ये, वो नहीं है. चलिए मैं चल रही हूँ, पर एक घंटा से अधिक नहीं दे पाउंगी.” मुझसे बोली “सामान लेकर तुम चलो, मैं आती हूँ” पास में खड़े कार में दोनों बैठ गए. सामान लेकर मैं रूम पर आ गया. सभी सामान को उनके जगह पर रखा और मोनिका के बारे में सोचने लगा. अचानक वो आवाज़ ध्यान आयी “रूमा अच्छा हुआ तू मिल गयी”.

‘रूमा?’ मोनिका का नाम रूमा भी है. कितना कुछ कर रही है मेरे लिए. पर क्यों? वहां कोठे पर किये गए मदद समझ आती है. पर बार बार! पता नहीं. दिल कह रहा था कि एक बहुत अच्छी इंसान है. दिमाग में इसके प्रोफेशन को देखते हुए चेतावनी के घंटी बज रहे थे. मोनिका को लेकर काफी देर तक मन में नेगेटिव-पॉजिटिव विचारों के उथल-पुथल चलते रहें. ऐसा होना भी उचित था क्योंकि इंसान का जब वक्त बुरा होता है तो दुनियां बुरी लगने लगती है.

अचानक मेरे रूम का दरवाजा खुला, मोनिका थी. अंदर से गेट बंद करके, अपने कपडे उतारने लगी.

मैं घबराता हुआ रूम के खिड़की की तरफ देखा जो खुली थी. लपक कर उठा और बंद किया.

“क्या कर रही हो? विंडो खुली थी.”

अपनी ब्रा उतारती हुई बोली “छुपाना किसे है! खुला दरबार है अपना. जो मर्जी देख लो.”

“अरे यहाँ शरीफ लोग रहते हैं पगली”

वह गंभीर हो गयी. मुझे देखने लगी. बोली “भाटिया अगली गली में ही रहता है. बड़े शरीफ लोग हैं. एक बेटा है जो कनाडा में बस गया, जवान बहु दिन भर वोडका मारती रहती है और भाटिया उसके सभी ऐयाशियों को पूरा करने में लगा रहता है. वाह! शरीफ लोग हैं! है न? उसी शरीफ घर के, शरीफ औरत की सेवा करके आ रही हूँ.” शॉपिंग वाली बैग में कुछ ढूंढते हुए बोली “तुम नहा लो.”

बैग से हेयर ट्रिमिंग मशीन निकाल कर, अपने पूरे तरह नंगे शरीर के बाल ट्रिम करने लगी.

“तुम्हे अपनी मम्मी से मिलवाउंगी और एक मिरेकल दिखाउंगी”

“कौन-कौन है तुम्हारे घर में?”

“मम्मी, मैं और हमदोनों का आशिक अजय राठी.”

“राठी तुम्हारे घर में ही रहता है?”

“नहीं. हम उसके घर में. मेरा मतलब उसके फार्म हाउस में”

“तुम्हारी मम्मी भी तुम्हारी तरह ही…”

“नहीं. उन्हें सिर्फ राठी के होटल के गेस्ट और उसके खास लोगों के लिए ही इजाजत है. वह भी सिर्फ दिन में. क्योंकि रात को उसके बिस्तर पर हम दोनों चाहिए होते हैं.”

मुझे झटका लगा “दोनों? मतलब तुम अपनी मम्मी के सामने भी ये सब… हाँ समझा. तुम्हारे लिए तो कॉमन होगा. यही सब देखती हुई तुम बड़ी हुई होगी ना!”

ट्रिम्मिंग रोक कर मुझे देखने लगी. धीरे-धीरे आँखें भर आयी और मोती बन कर बूंदें  गिरने लगीं.

मुझे लगा, मैं कुछ गलत बोल गया.

अपने हाथ से आंसू पोछती हुई बोली “कभी सावित्री राव का नाम सुना है?

नाम सुनी-सुनाई सी लग रही थी. मैं अपने दिमाग पर जोर डाल कर याद करने लगा. “वो, एथलिट लड़की जो साइंस टॉपर थी?”

“मैं ही हूँ.” आँखों से आंसू बहने लगे थे.

और आगे लिखने की हिम्मत नहीं हो रही अभी. फिर कभी…

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